देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। भगवान श्री कृष्ण और श्रीराधारानी की लीला स्थली में प्रत्येक 11 वर्षों के बाद यह आयोजन होता है। इस बार का महाकुम्भ कुछ ज्यादा ही अद्भुद है, महाकुंभ इस लिए कि कुछ लोग यहां की दिव्यता को देख कर इस आयोजन को यही संज्ञा दे रहे हैं। हालांकि सरकारी दस्तावेजों मंे इस आयोजन को कुंभ पूर्व वैष्णव बैठक कहा गया है।
फिर लौटते हैं आयोजन की दिव्यता पर श्रद्धा, भक्ति, शक्ति का अनूठा संगम, कहीं भाव तो कहीं हट योग का दर्शन और विशाल अखाड़ों के द्वार, पांडाल, बड़ी बड़ी जटायें, कही शानो-ओ-शोकत तो, कहीं दिखावा तो, कहीं पर कथा भागवत के प्रवचन, भोजन भंड़ारे, रासलीला नाच गाना, भजन के बीच थिरकते श्रद्धालु, कहीं लीला तो कहीं जुगल छवि को रिझाने के लिए समाज गायन, कहीं फूलों की होली तो कहीं यमुना नदी में समाधि योग तो कहीं यमुना की बालू में एक टांग पर खड़े खडेश्वरी बाबा, कहीं यमुना तट पर साधना तो कहीं शान्ति में विश्राम और कहीं औघड़ बाबाओं का जमघट इन्हें न खाने की चिन्ता न इन्हें सांसारिक जीवन से कोई दरकार न भोजन की आवश्यकता न शारीरिक कष्टों का अहसास न ही आने जाने वालों की चिन्ता। ऐसा है भव्य दिव्य वृन्दावन का महाकुम्भ। महाकुम्भ इस लिए की अभी तक हुई वैष्णवों की दो बैठकों में निर्णय लिया गया है कि इसे कुम्भ पूर्व वैष्णव बैठक न कह कर इसे महाकुम्भ कहा जाये क्यों कि कुम्भ की शुरूआत सर्वप्रथम वृन्दावन में गरूणजी द्वारा अल्प विश्राम किये जाने के समय से है अतः सर्व प्रथम कुम्भ वृन्दावन में ही माना जाये जाना जाये।













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