देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। पति की आयु लंबी हो इसलिए महिलाओं ने शुक्रवार को वटवृक्ष की पूजा की। महिलाएं वटवृक्ष की पूजा के लिए पहुंचीं। उन्होंने वट सावित्री की पूजा अर्चना की। सौभाग्यवती होने की कामना की। सुबह से ही पूजा-अर्चना शुरू हो गई थी। स्नान करने के बाद महिलाओं ने सूर्य देवता को जल अर्पित किया। इसके बाद सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए घर या फिर आसपास लगे वटवृक्ष पर सूत बांधते हुए परिक्रमा की और पति की लंबी आयु की कामना की।
भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर अध्ययन कर रहीं अदिति अग्रवाल ने बताया कि बरगद का वृक्ष एक दीर्घ जीवी विशाल व्रक्ष है भारतीय शास्त्रों के अनुसार इसके पूजन से ओरफ इसकी जड़ में जल देने से पुण्य की प्राप्ति होती है यह व्रक्ष त्रिदेवों का प्रतीक है इसकी छाल में विष्णु, जड़ में ब्रह्मा, और शाखाओं में शिव का वास माना जाता है जिस प्रकार पीपल को विष्णु जी का प्रतीक माना जाता है उसी प्रकार बरगद को शिवजी का प्रतीक माना जाता है यह बहुत लंबे समय तक जीवित रहता है अतः इसे अक्षय वट भी कहते हैं इस वृक्ष को मनोरथ वृक्ष भी कहते हैं अर्थात मोक्ष देने वाला या मनोकामना पूर्ण करने वाला।
प्रति वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या को सुहागिनों द्वारा वट सावित्री व्रत का पर्व मनाया जाता है। तथा इसी दिन सूर्य पुत्र शनि महाराज की जयंती भी मनाई जाती है। शनि के बारे में ज्योतिष की व्याख्या रही है कि शनि जिस पर प्रसन्न हो जाये तो माला-माल कर देते हैं और रुष्ट हो जाये तो खाक में मिला देते है इस लिए शनि जंयती पर शनि महाराज की विशेष पूजा अर्चना की जाती है।
सावित्री और सत्यवान की कथा सबसे पहले महाभारत के वन पर्व में मिलती है जब युधिष्ठर मार्कण्डेय ऋषि से पूछते हैं कि क्या कभी और कोई स्त्री हुई जिसने द्रौपदी जैसी भक्ति प्रकट की अर्थात एक राजकुमारी होने के पश्चात वनों में भटकते हुए निर्धनों की तरह त्याग की भक्ति प्रस्तुत की ? तब मार्कण्डेय ऋषि ने युधिष्ठर को सावित्री और सत्यवान की कथा सुनाई।
मध्रदेश के राजा का नाम अश्वपति था राजा के कोई संतान न थी तब उन्होंने देवी सावित्री की उपासना की जिससे उन्हें एक कन्या प्राप्त हुई उसका नाम सावित्री रखा । दूसरी ओर शाल्व देश के राजा घुमत्सेन के पुत्र का नाम सत्यवान था सत्यवान के पिता को आंखों से अंधा होने के कारण राज गद्दी से उतार दिया था अतः राजा अपने परिवार के साथ वन में निवास करने लगे।
जब राजा अश्वपति को सावित्री के लिए कोई योग्य वर न मिला तो उन्होंने वर ढूंढने के लिए स्वयं सावित्री को भेजा। सावित्री एक वन में जा पहुंची यहां उनकी भेंट सत्यवान से हुई सत्यवान को देखते ही सावित्री ने उन्हें अपने पति के रूप में वरण किया।
अदिति अग्रवाल ने बताया कि भारतीय सभ्यता में मनुष्य का जीवन प्रकृति के इर्दगिर्द ही अपना तानाबाना बुनता है। हमारी मान्यताएं, उत्सव, तीज त्योहार सब प्रकृति से जुडे हैं। हमें सिर्फ तीज त्योहारों, उत्सव मनाने तक सीमित न रहें हमें यह भी समझना होगा कि यह सब क्यों शुरू हुआ और क्यांे हो रहा है।













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