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तपती दोपहरी में दिखी एक मां की 'विवशता'

आज दोपहर के दो बजे मथुरा हाइवे होकर प्रवासियों का जाता हुआ एक ग्रुप मिला....जो दिल्ली से होते हुए महोबा का सफर तय कर रहा है... दिल्ली से महोबा की दूरी 577 किलोमीटर है.... उनसे पूछा अब तो बस चला दी है पैदल क्यों निकल रहे हो... जवाब आया की आप हमे बैठा दो... मेने विस्तार से पूछा तो महोबा के रहने वाले राजू ने बताया की रविवार को दिल्ली से निकलें है... खेर राजू के बारे में बताओ तो वो 22 साल का एक युवक है जो अपने भाई के साथ एक दिल्ली से खरीदी हुयी पुरानी साइकिल पर निकल दिया राजू दिहाड़ी मजदूरी का काम करता है...जो अब बंद है पैसे खत्म हो गएँ....सरकार खाना दे रही है तो इस बात पे बोला सब झूठ है नहीं मिला इसलिए निकल दिए...रविवार की देर रात चला था आज मथुरा पहुंचे...खेर और प्रवासियों जैसी अलग अलग बातें...खास बात ये थी आज सरकार फिर विफल हुयी आखिर क्यों....? क्या दिक्कत है सैकड़ो मजदूर चल रहे है... उन्ही के साथ चल रही कमलेश ने बताया की खाने को नहीं मिला इसलिए तो चल दिए...कमलेश ने कहा खाना मिल सकता है...मेने कहा आगे चलिए खाना मिलेगा खेर मथुरा में शायद अब बहुत जरूरत थी इसकी...दिल्ली से होता हुआ सफर..... हरियाणा होता हुआ..... उत्तर प्रदेश के महोबा तक जाना है कुछ साइकिलों पे तो कुछ पैदल आखिरकार सरकार क्या कर रही है... क्या ये इंसान नहीं कोई पटरी पे थक के सो जाता है... तो बड़ा हादसा हुआ.... तो कहीं भूख की तड़प.... दोष किसे दे कोरोना जैसी महामारी को या सिस्टम को या इनकी गरीबी को....? लिखने को बहुत कुछ था बताया भी बहुत कुछ सोचनीय बात एक है आखिरकार सिस्टम क्यों फ़ैल रहा... खाने की बात हुयी...वो गायब मिला तो सही पर वो भी अधूरा....जाने की बात हुयी गए तो सही पर वो भी अधूरा....आखिर क्यों अधूरा रहता है हर काम.... एक बात आखिर में उसमे एक छोटी बच्ची अपनी माँ से कह रही थी कितनी दूर है गांव माँ ने कहा आने वाला है.... आँखों में आंसुओं को लेकर एक आस के साथ चलते हुए की घर पहुंचना.....ऐसी दर्जनों बातें है....तपती हुई दोपहर है...विवशता क्या होती है आज देखने को मिली न कुछ कर सके न कुछ बोल सके सिर्फ चल दिए.....आये थे काम करने बड़े शहर में फिर चल दिए उस गांव में जहां से आये थे... सबकी तरह इनसे भी पूछा की लौटोगे....जबाब मिला अब नहीं....इस महामारी ने इंसानो को बहुत कुछ सिखाया है....फिर विराम देता हु अपनी बात को आगे फिर एक नयी हमारी बात के साथ. ...|  

 

नारद संवाद

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