देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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मथुरा। पहले कृष समृद्धि का आधार ही पषुपालन था, लेकिन घटती जमीन और बढते मषीनीकरण ने पषुओं की उपयोगिता को कम किया है। अब जो दुधारू पषु हैं किसान उन्हीं का पालन कर रहे हैं। खास कर गौवंष में साडों को खुला छोड देते हैं। ये आवारा सांड समस्या का कारण बन रहे हैं। गांवों में इस समय आवारा घूम रहे साडं फसलों को चैपट कर रहे हैं। ष्षहरों में सडकों पर घूमते सांडों से बडी दुर्घटनाएं हो रही हैं। इस समस्या से निजात दिलाने के लिए उत्तर प्रदेष सरकार ने सेक्स साॅर्टेड सीमन(पषुओं में वर्गीक्रत वीर्य का स्तेमाल) योजना को मंजूरी दी है। इस सीमन से गाय के बछिया को जन्म देने की संभावना 90 से 95 फीसद है। इस योंजना को लागू करने से पहले इटावा, लखीमपुर-खीरी और बाराबंकी में पायलेट प्रोजेक्ट के तौर पर इस का प्रयोग किया गया। सरकार ने अब इस योजना को प्रदेष के 75 जिलों में लागू किया है।
मथुरा में चल रहा है सफल प्रयोग
गोषाला प्रबंधन से जुडे दिलीप कुमार यादव ने बताया कि हासानंद गोषाला में गायों द्वारा षतप्रतिषत बछिया को जन्म देने की तकीनक पर कफी काम हुआ है। इस प्रयोग में काफी हद तक कामयाबी मिल रही है। यहां किसानों के लिए इस सीमन का प्रयोग किया जा रहा है। इस सीमन का प्रयोग करने वाली यह प्रदेष की पहली गोषाला है। यहां नाइट्रोजन कंटेनरों मे देष की प्रयोग षालाओं से मंगा कर हर नस्ल का सीमन रखा जाता है। गोषाला में विदेषी नस्ल की एक भी गाय नहीं है।
यह पहल करने वाल प्रदेष की पहली गोषाला
मथुरा-वृंदावन मार्ग स्थित हासानंद गोचर भूमि ट्रस्ट गोषाला में देष को सांडों की समस्या से निजात दिलाने के लिए बडे स्तर पर काम किया जा रहा है। संस्था के सचिव सुनील कुमार षर्मा ने बताया कि देष के किसी भी संस्थान या विष्वविद्यालय को यदि साहीवाल, गिर, थारपारकर, राठी आदि नस्ल की षुद्ध गाय चाहिए तो वह दूरदराज के उन गांवों का रूख करते हैं जहां आज भी विज्ञान नहीं पहुंचा है, क्यों कि इन्हीं जगहों पर नस्लीय षुद्धता मिल पाती है। गौषाला में भी ये नस्लें मौजूद हैं।
दूध उत्पादन के मामले में हम दुनियां में नम्बर वन हैं, लेकिन प्रति पषु उत्पादन में हम काफी पिछडे हुए हैं। एक अनुमान के मुताबिक हमारे यहां दूध उत्पादन का औसत महज तीन लीटर प्रति पषु है। जबकि यह औसत आस्ट्रेलिया में 16 और इजराइल में 36 लीटर प्रति पषु है। हम दूध उत्पादन में सबसे आगे इस लिए हैं कि हमारे यहां 300 मिलियन पषु हैं।
दिलीप यादव, पशुपालन विशेषज्ञ













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