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कल से शुरू हो रहा पितरों के प्रति श्राद्ध पखवाड़ा

पितर पक्ष 24 सितम्बर से प्रारंभ 8 अक्टूबर तक
 
 
मथुरा। पितर पक्ष 24 सितम्बर पूर्णिमा से प्रारंभ हो रहा है जो 8 अक्टूबर को पितर विसर्जन अमावस्या को पूर्ण होगा। श्राद्ध पितरों के ऋण को चुकाने की प्रक्रिया है। जिसमें पूर्वजों, पुरखों के प्रति कृतज्ञता का भाव होता है। जिसमें अपने पुरखों के प्रति श्रद्धा नहीं होती वो श्राद्ध करने का अधिकारी नहीं होता।   
संघठन मंत्री मथुरस्थ सर्वकर्म पांडित्य समिति मथुरा अमित भारद्वाज ने बताया कि महऋषि वेद व्यास के अनुसार जो व्यक्ति श्राद्ध द्वारा अपने पितरों को संतुष्ट करता है वह पितर ऋण से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है। महऋषि जाबालि के अनुसार पितर पक्ष में श्राद्ध करने से पुत्र  आयु, आरोग्य, अतुल एश्वर्य व इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करता है। महऋषि काषनार्जिनी के अनुसार पितर पक्ष में पितर लोग श्राद्ध न पानें पर निराश होकर दीर्घ स्वांस लेते हुए गृहस्थ को दारुण दुख का श्राप देकर पितरलोक को वापस चले जाते हैं। श्राद्ध के समय उच्चारित नाम, गोत्र एवं मंत्रों से अर्पित द्रव्य वायु रूप में प्रविश्ट होकर पितरो को प्राप्त होते हैं। श्राद्ध के द्रव्य उडद, जो, चावल कन्दमूल फल और घी हैं, तिल और उडद की दाल का प्रयोग महत्वपूर्ण हैं। गरुणपुराण में उल्लेख मिलता है कि तिल स्वेद प्रभु के पसीने की बूंद हैं पितरों का आवास दक्षिण दिशा में होने के कारण श्राद्ध दक्षिणामुख होकर एवं जनेऊ को दाहिने कंधे पर रख कर किया जाता है। कुश को पवित्र माना गया है। श्राद्ध में जड़ सहित कुशा प्रयोग करना चाहिये क्योंकि कुशा का ऊर्ध्व भाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्यों का एवं जड पितरों की होती हैं। प्रभु श्री राम ने भी दशरथ का श्राद्ध गोदावरी के तट पर किया था एवं गया में पांडवों द्वारा गया में राजा पांडु का श्राद्ध किया था।
 
 ये करें श्राद्ध पक्ष में 
इस अवधि में प्रतिदिन ठाकुरजी का भोग लगाकर गौग्रास निकालना चाहिये। श्राद्ध की तिथि के दिन गौ.ग्रास के अलावा कौआ, कुत्ता, जलचर जैसे कछुआ, मछली का भी ग्रास निकालना चाहिये, विद्वान व सात्विक ब्राह्मण को श्रद्धा के साथ भोजन करा के भेंट व उपहार देना चाहिये। तत्पश्चात योग्य आचार्य के निर्देशन में तर्पण, जल दान, अवश्य करना चाहिये।                       
 
श्राद्ध पक्ष में ये काम न करें 
श्रद्ध पक्ष में दिन में सोना नहीं चाहिये। इसके अलावा असत्य बोलना, रति क्रिया, शरीर पर तेल, साबुन, इत्र लगाना, मदिरापान, अनैतिक कृत्य, वादत्रविवाद, जुआ खेलना एवं किसी जीवधारी को कष्ट नहीं पहुचाना चाहिये।
 
गरीब व्यक्ति के लिये 
जो गरीब व्यक्ति श्राद्ध करने मे असमर्थ है वह तिल, जो, चावलयुक्त जल से तिलांजलि देकर भी इस की पूर्ति कर सकता है, जो ये भी करने में असमर्थ हो वह दक्षिण दिशा की ओर मुख करके श्रद्धा के साथ अपने पूर्वजों का स्मरण करें, इससे भी पितर संतुष्ट हो जाते हैं। यदि किसी कारणवश योग्य ब्राह्मण न मिले तो एक मनुष्य की खुराक की पूरी सामिग्री गाय को खिला देना श्रेयसकर है।

 

नारद संवाद

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