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देश विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालु

श्रीकृष्ण जन्मस्थन पर भागवत भवन में पीताम्बरधारी भगवान श्रीकृष्ण की छवि को निहारते श्रद्धालु। मथुरा(सुनील शर्मा)। श्रीकृष्ण जन्मस्थान के भागवत भावन में अधीरता है, सैकड़ों की संख्या में भागवत भावन के अंदर, हजारों की संख्या में श्रीकृष्ण जन्मस्थान प्रांगण और लाखों की संख्या में सड़ाकों पर भक्त अपने आराध्य के ्रप्राकट्य का अतुरता से इंतजार कर रहे हैं। एक एक बल एक वर्ष सा लग रहा है। भागवत भावन के श्रद्धालुओं का रैला लगातार बढ़ता जार रहा है और सेवायत श्रद्धालुओं को दूसरी ओर से बाहर निकाल रहे हैं। श्रद्धालु अपना सब कुछ लुटाने को तैयार हैं लेकिन भागवत भावन से निकलने को नहीं, अधीरता और उत्सुकता का समावेश ऐसा कि भगवान के प्रति भक्त की अगाध आस्था का वर्णन महाकवि भी शब्दों में न कर सके। 

 भापद अष्टमी की वही स्याह काली रात आसमान में छायीं काली घटाएं और रुकरुक कर आसमान से गिर रहा पानी, कलयुग में भी द्वापर जैसी कान्हा की जन्मवाली कोठरी की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था। भद्रपद की अष्टमी की मध्यरात्रि को कलयुग में भी द्वापरयुग के समान गृहनक्षतों का मिलन, दस योगों का सटीक संयोग मानो कान्हा की नगरी एक बार फिर द्वापर युग में प्रवेश कर गई थी। श्रद्धालु आसामन की ओर निहारते हैं तो कभी जमीन की तरफ देखते हैं, चंद्र दर्शन के साथ ही भगवान के जन्मोत्सव की प्राकृतिक घोषणा हो जाती है लेकिन आसमान में छाये बादलों से चंद्रम के दर्शन देने की भी उम्मीद नहीं है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि के भागवत भावन में इसी बीच भक्त और भगवान के बीच दीवार बना सूती कपड़े का परदा धीरे धीरे खिसकने लगता है। भगवत भवन का खामोसी अचानक टूट जाती है, भागवत भवन जयकारों की ध्वनि से गूंजायमान हो उठता है। शंख, मजीरों की ध्वनि रात की निरवता को तोड़ती हुई श्रद्धालुओं के कानों तक पहुचती है। यह इस बात की घोषणा अजन्मे का जन्म हो चुका है। सेवायत पंचामृत से भगवान के विग्रह का अभिषेक शुरू कर देते हैं। दिव्य गो प्रतिमा भगवान के जन्म के बाद अपने पयोधरों की पवित्र दुग्ध-धारा से भगवान के चल विग्रह का अभिषेक किया गया। भगवान का प्राकट्य रजत निर्मित दिव्य कमलपुष्प में हुआ। श्रीकृष्ण के स्वरूप श्रीसालिग्राम भगवान खीरे से प्रकट हुए।
 इस क्षण का साक्षी बन कर श्रद्धालुओं की मानों जन्मजन्मांतर की मुराद पूरी हो जाती है। सड़क से लेकर श्रीकृष्ण जन्मस्थन परिसर और भागवत भावन तक हर और भगवान और भक्त के अद्भुत मिलन का साक्षी बनकर मानों प्रकिृति भी इठला उठी हो। 
 
 

नारद संवाद

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