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कलयुग का प्रभाव ही हमारे मन में अविश्वास प्रकट करता है - देवकीनंदन महाराज

कलयुग का प्रभाव ही हमारे मन में अविश्वास प्रकट करता है - देवकीनंदन महाराजमथुरा(सतपाल सिंह)। विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में प्रियाकान्तजू मंदिर के सामने भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई । कथा के मध्य देवकीनंदन महाराज ने कहा कि मानव का विचित्र मन हर उस काम में लगता है जिसे संत, गुरू, महात्मा मना करते हैं, पुराण, वेद जिसे वर्जित बताते हैं। यही कारण है कि जीव उसका फल भोगता है । असभ्य वातार्लाप को संस्कारों की कमी बताते हुये देवकीनंदन महाराज ने कहा कि किसी को गाली देने, अपशब्द बोलने में लोग अपनी कला समझते हैं लेकिन ये कला नहीं है ये उनके माँ-बाप की कमजोरी है । जिन्होंने उन्हें सिखाया ही नहीं है की किसी को अपशब्द बोलना आपके संस्कारों और परवरिष का परिचय है। इसमें अपमान व्यक्ति का नहीं उनके माँ-बाप का है। 
देवकीनंदन महाराज ने आगे कहा कि कलयुग की प्रवृति ही हमारे मन में अविश्वास प्रकट करती है, इस बात का हमेशा ध्यान रखें। जब कभी भी हमारे मन में अविश्वास होता है चाहे वो धर्म के प्रति अविश्वास हो, चाहे गुरू के प्रति अविश्वास हो, चाहे भगवान के प्रति अविश्वास हो, धर्म से संबंधित अविश्वास कलयुग का ही प्रभाव है। इसका प्रभाव ही हमें पापी बनने पर विवश करता है। जब-जब हमारा मन अधर्म की ओर बढ़े और सज्जनों के प्रति विश्वास ना रहे तो समझ लेना चाहिए की कलयुग हम पर हावी हो रहा है।
महाराज श्री ने भागवत की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यह भगवान की भागवत, भक्तों की कथा है, ये पांचवा वेद है। वेद व्यास जी महाराज ने सभी वेदों का सार इसमें है और सबसे आखिर में लिखा ये पुराण है इसलिए पुराणों का भी सार है । कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित एच.पी. अग्रवाल, राजेष सिंह, विष्वनाथ केड़िया, श्रवण केसरी, सन्तोष कुमार, आचार्य इन्द्रेषशरण, श्यामसुन्दर शर्मा, रूपा जैयसवाल, आचार्य चन्द्रप्रकाष शर्मा आदि कई गणमान्य उपस्थित थे । 

नारद संवाद

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