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संचार क्रांति के कोहिनूर राजीव से वो रोचक मुलाकात

संचार क्रांति के जनक राजीव गांधी का इंटरव्यू लेते ब्रज प्रेस क्लब के अध्यक्ष एवं उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष कमलकांत उपमन्यु एडवोकेट। मथुरा(केके पाठक)।  वो 21 मई 1991 की काली रात। मैं अपने घर में था। मौसम खराब था। झमाझम बरसात और आंधी तूफान। कड़कडती बिजली जैसे किसी बड़ी अनहोनी की गर्जना कर रही थी। बरसात कुछ थमी तो करंट सी दौड़ती एक खबर मेरे कानों में पड़ी। मैं सुनकर सन्न रह गया था, मैं ही क्या पूरा राष्ट्र स्तब्भ था। यूं कहिये आंधी तूफान के साथ बदलते बादल के साथ प्रकृति रोने लगी हो। खबर थी तमिलनाडु के पेरंबदूर में भारतीय राजनीति के चमकते सितारे प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की। यह हत्या थी देश के एक युवा सपने की, वह सपना जो धीरे-धीर हिन्दुस्तान की सियासत से विश्व विरादरी में साकार होने की ओर बढ़ रहा था। मेरी लिए राजीव गांधी के खास मायने थे, मुझे याद है कि उनके पेरंबदूर के दौरे से कुछ महीने पहले के उनके राजस्थान के दौरे की। ट्रेन में सवार राजीव गांधी से मेरी वह पहली करीबी मुलाकात थी, उनके सरल और सहज स्वभाव के आगे मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं एक प्रधानमंत्री के सामने बैठा हूं। मेरी राजीव गांधी से मुलाकात बड़े भाई मथुरा-वृंदावन सीट से तब विधायक और अब कांग्रेस के उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रदीप माथुर ने कराई। राजीव गांधी उस पल केन्द्रीय मंत्री एचके एल भगत से बातों में मशगूल थे, उन्होंने फिर मेरी ओर देखा और बोले, कमलकांत पूछो क्या पूछना चाहते हो, मैं बेहद उत्साहित था, इस विशेष इंटरव्यू को लेकर। मैने पहला सवाल पूछा था कि देश के विकास के लिए आप क्या-क्या करना चाहते हैं। कुछ गंभीर हुए फिर बोले, दूर संचार क्रांति के जरिये तकनीकी रूप से भारत को मजबूत करना होगा। संचार क्रांति लानी होगी, जिससे देश का युवा रोजगार पा सकेगा। देश उन्नति कर सकेगा, विश्व विरादरी में भी भारत सशक्त  देशों की कतार में खड़ा होगा। मैने पूछा, कांग्रेस की मजबूती के लिए आप क्या करना चाहेंगे। सवाल पर पहले राजीव ने एचके भगत की ओर देखा फिर मुस्कराये और बोले, कांग्रेस का संगठानिक ढांचे में कुछ बदलाव की जरूरत है। उनका कहने का आश्य साफ था कि वे मनोनीत प्रक्रिया में नहीं बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से संगठानिक चुनावों के जरिये पदों पर कार्यकर्ता काबिज होने की प्रक्रिया को और भी मजबूत करना चाहते हैं। उनकी मंशा थी कि जो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता मेहनत करता है, कांग्रेस के लिए दिन रात पसीना बहाता है, उसे उसकी मेहनत का सम्मान, वाजिव हक उसे मिलना चाहिए। वह तभी संभव हो सकता है कि जब संगठानिक चुनावी कसौटी पर कसकर ही कार्यकर्ता पदों पर आसीन हो। यह उनकी कांग्रेस को ताकतवर पार्टी बनाने की दूर गामी सोच थी। मैं देखता हूं कि आज राजीव गांधी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वे संचार क्रांति का ऐसा रास्ता तैयार करके गये, जिस पर कुछ वर्षों में भारत कम्प्यूटर युग की ओर तेजी से दौडऩे लगा और कम्प्यूटर युग से देश के युवाओं की तकदीर बदलने में देर नहीं लगी। यही नहीं देश को चुनाव प्रक्रिया में इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें जैसा सरल विकल्प दिलाया। जिससे कई दिनों का काम कुछ घंटों में होता है। टेक्नलॉजी के जरिये यह संभव होना, राजीव की ही देन थी। आज के दिन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का 74 वां जन्मदिवस है, मुझे उनका ट्रेन में लिया गया इंटरव्यू रह-रह कर याद आया।

नारद संवाद

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