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आईएनएस कलवरी नौसेना में शामिल, समंदर में बढेगी भारत की ताकत

आईएनएस कलवरी नौसेना में शामिल, समंदर में बढेगी भारत की ताकतमुंबई। भारतीय नौसेना की ताकत और भी बढने वाली है। देश में निर्मित स्कॉर्पीन श्रेणी की पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवरी को भारतीय नौसेना के बेडे में आज शामिल किया जा रहा है। 1,564 टन के इस सबमरीन प्रॉजेक्ट-75 के अंतर्गत बनाया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार सुबह इसका उद्घाटन किया। उनके साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, राज्यपाल सी विद्यासागर राव, रक्षा मंत्री निर्मला सीतरमण भी मौजूद थीं।

 

आईएनएस कलवरी एक डीजल-इलेक्ट्रिक युद्धक पनडुब्बी है, जिसे भारतीय नौसेना के लिए मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने बनाया है। यह स्कॉर्पिन श्रेणी की उन 6 पनडुब्बियों में से पहली पनडुब्बी है, जिसे भारतीय नौसेना में शामिल किया जाना है। यह मेक इन इंडिया पहल की कामयाबी को दर्शाता है। इस परियोजना को फ्रांस के सहयोग से चलाया जा रहा है। फ्रांस की रक्षा एवं उर्जा कंपनी डीसीएनएस द्वारा डिजाइन की गयी पनडुब्बियां भारतीय नौसेना के प्रोजेक्ट-75 के तहत बनायी जा रही हैं। 

 

स्कार्पीन सबमरीन को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह कई तरह के अभियानों में हिस्सा ले सकती है। जैसे एंटी सरफेस वॉर, एंटी सबमरीन वॉर, इंटेलिजेंस इक_ा करना, माइंस बिछाना और एरिया सर्विलांस जैसे काम हैं। कलवरी सभी तरह के थियेटर में काम कर सकती है। इसका मतलब ये है कि नौसैनिक टास्क फोर्स के साथ मिलकर भी यह काम कर सकती है।

 

कलवरी के निर्माण के साथ एमडीएल ने सबमरीन के कॉम्लेक्स ऑर्ट में अपनी महारत साबित कर दी है। भारत अब सबमरीन बनाने वाले देशों में अपनी जगह मजबूत कर चुका है। एमडीएल ने दूसरी स्कार्पीन खांदेरी बनाई थी और इसे जनवरी 2017 में लॉन्च किया गया था। खांदेरी का अभी समुद्र में ट्रायल चल रहा है।

 

कलवरी का नाम हिंद महासागर में पाई जाने वाली खतरनाक टाइगर शार्क के नाम रखा गया है। नौसेना की परंपरा के मुताबिक शिप और सबमरीन के सेवामुक्त होने पर उन्हें दोबारा अवतरित किया जाता है। वैसा ही कलवरी के साथ भी हुआ। ये साल भारतीय सबमरीन ऑपरेशंस के पचासवें साल को गोल्डेन जुबली के तौर पर मनाया जा रहा है। इसके लिए फ्रांस की डीसीएनएस और एमडीएल के बीच अक्टूबर 2005 में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए समझौता हुआ था।

 

पहली कलवरी 8 दिसंबर 1967 में भारतीय नौसेना में शामिल हुई थी और यह भारत की पहली सबमरीन भी थी। इसे 31 मार्च 1996 को 30 साल की राष्ट्रसेवा के बाद भारतीय नौसेना से रिटायर किया गया।

एक सच्ची नॉटिकल परंपरा के मुताबिक कलवरी का फिर से अवतरण होगा। स्कार्पीन सबमरीन एक बार फिर से समुद्र की गहराई में राष्ट्र के नौसैनिक हितों की रक्षा के लिए कुलांचे भरेगी।

साभार-khaskhabar.com 

 

 

 

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