देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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मथुरा। एक ओर राम की जय-जयकार से गूंज रहा था कान्हा का धाम और दूसरी तरफ लंकेश्वर रावण का जयघोष गूंजा। महापण्डित के भक्तों ने ऐलान किया कि जल्दी ही शिव संग राम के आचार्य रावण का विशाल मंदिर बनाया जाएगा। अनूठे उत्सव में इस बार दर्जनों रावण वंशी शामिल हुए।
कृष्ण की पटरानी यमुना उप पार शमसान स्थित शिव मंदिर पर शिव के अनन्य भक्त महापण्डित संग त्रिकालदर्शी रावण की पूजा पुलस्त्य कुल को ललकारती दिखाई दी। लंकेश भक्त मण्डल के संस्थापक संग प्रमुख ओमवीर सारस्वत एड. ने कहा कि राम ने लंका विजय का आशीष राम को दिया था। रावण सीता के पिता थे। रावण के पुतले फूंकना किसी दृष्टि से उचित नहीं है, यह प्रक्रिया रुकनी चाहिए। इससे पूरा रावण वंश अपमानित हो रहा है। यह सारस्वत समाज के साथ अन्याय है।
संजय सारस्वत एड. ने कहा कि राम ने लंकेश का शव विभीषण को देकर विधि विधान से उनका अंतिम संस्कार कराया था। अपमानित नहीं किया था। जैसा कि आजकल कथित राम भक्त कर रहे हैं। रावण स्वरूप कुलदीप अवस्थी बने। भक्तों ने पहले शिव और बाद में लंकेश की पूजा-आरती की। प्रसाद बांटा। हर-हर महादेव, लंकेश की पूजा-जय-जयकार करने वालों में सुनहरी लाल सारस्वत, मुकेश सारस्वत प्रधान, आयोजक डा. बीडी शर्मा. डा. सीएफ धनगर, शिवसिंह चंदेल, सत्यस्वरूप सारस्वत एड., दीपक, सूरज प्रसाद, संतोष शर्मा, देवपाल योगी, आकाश सारस्वत, आचार्य रमेश चंद्र शर्मा, लोकेश सारस्वत, आरसी सारस्वत, दीपांशु अवस्थी, अजय सारस्वत, अंकुर सारस्वत, योगेश गौतम, गजेंद्र सारस्वत, गोपाल राया, भोलेश्वर आयराखेडिया, भूपेंद्र धनगर, प्रमोद कुमार, धर्मेंद्र धनगर, विष्णु कुमार, राकेश शर्मा, ब्रजेश सारस्वत, पंकज सारस्वत आदि प्रमुख थे।













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