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मन की बात: सरकार की जवाबदेही जरूरी, तनावमुक्त जीवन के लिए योग अहम

मन की बात: सरकार की जवाबदेही जरूरी,तनावमुक्त जीवन के लिए योग अहमनई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 32वीं बार रेडियो पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम के जरिए देश को संबोधित किया। पीएम मोदी के मन की बात को बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह भी लोगों के बीच जाकर रेडियो पर सुना। अमित शाह दिल्ली के आरके पुरम इलाके में गरीब लोगों के साथ रेडियो पर इस कार्यक्रम को सुना। उनके साथ दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी समेत कई नेतागण मौजूद रहे।

अपने संबोधन में सबसे पहले पीएम मोदी ने सभी देशवासियों को रमजान की मुबारकबाद दी।वहीं पीएम मोदी ने योग दिवस पर इस बार तीन पीढ़ियों के साथ योग करने की तस्वीर उन्हें भेजने को कहा है।

स्वच्छ भारत अभियान की सफलता पर खुशी जताते हुए पीएम ने देशवासियों से गीले और सूखे कचरे को अलग अलग रखने का आह्वान किया, ताकि इनका इस्तेमाल खाद बनाने में इस्तेमाल किया जा सके।

पीएम ने कहा कि सरकार की तीसरी सालगिरह पर कई सर्वे हुए है जिसमें लोगों ने खासी दिलचस्पी दिखाई जिसे देखकर मुझे काफी खुशी हुई।सरकार की जवाबदेही जरूरी होती है

वहीं मन की बात कार्यक्रम ने मुझे हर परिवार का सदस्य बना दिया है उन्होंने कहा मुझे ऐसा प्रतीत होता है मैं आप सबसे परिवार की सदस्य की तरह बैठक बात कर रहा हूं।

मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर 26 मई को मन की बात को किताब के रूप में लॉन्च किया गया। मन की बात : ए सोशल रिवोल्युशन ऑन रेडियो’ और ‘मार्चिंग विद ए बिलियन- एनालाइजिंग नरेन्द्र मोदी गवर्नमेंट एट मिडटर्म’ के नाम राष्ट्रति भवन में दो किताबों का अनावरण किया गया। दोनों किताबों की पहली प्रति राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को सौंपी गई। पिछली बार मन की बात में पीएम मोदी ने लोगों के दिमाग में भीतर तक घुसी वीआईपी संस्कृति को जड़ से उखाड़ फेंकने और सभी भारतीयों को महत्व देने की जरूरत पर बल दिया था। मोदी ने कहा था कि समय आ गया है, जब वीआईपी संस्कृति को बदलकर ईपीआई (हर व्यक्ति महत्वपूर्ण) कर दिया जाए। मोदी ने कहा, हमारे देश में वीआईपी संस्कृति के लिए एक प्रकार की नफरत है, लेकिन जब सरकार ने अधिकारियों की गाडियों से लाल बत्ती हटाने का फैसला किया तब मैंने महसूस किया कि यह नफरत कितनी भीतर तक घुसी है। यह लाल बत्ती वीआईपी संस्कृति की सूचक बन गई है, जो हमारे दिमाग में भीतर तक घुसी है। लाल बत्ती को हटाना केवल हमारी प्रणाली का एक हिस्सा भर है, लेकिन हमें इस संस्कृति को अपने दिमागों से हटाने का प्रयास करना होगा।

साभार-khaskhabar.com

 

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