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जब सचिन का सिर फंसा बालकनी की ग्रिल में,आधा घंटे तक...

जब सचिन का सिर फंसा बालकनी की ग्रिल में,आधा घंटे तक...नई दिल्ली । मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर का सोमवार को 44वां जन्मदिन है। क्रिकेट मैदान पर लगभग हर रिकॉर्ड अपने नाम करने वाले सचिन को हमेशा जिद रही रन बनाने की, क्रिकेट को जीने की। क्रिकेट में 34,347 रन बनाने वाले सचिन का जन्म मुंबई में 24 अप्रैल,1973 को एक मराठी परिवार में हुआ था। सचिन अपने घर में सबसे छोटे और जिद्दी थे। 

अपनी बायोग्राफी में सचिन ने इस जिद्दीपन का जिक्र किया है। बचपन में उनके दोस्त साइकिल चलाते थे, लेकिन सचिन के पास साइकिल नहीं थी। उन्होंने अपने पिता रमेश तेंदुलकर, जो एक मराठी कवि थे,से साइकिल खरीदने को कहा, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उनके पिता ने इस बात को टाल दिया था। इस बात से सचिन इतने नाराज हुए कि सप्ताह भर घर से बाहर खेलने नहीं गए और घर की बालकनी से ही अपने दोस्तों को साइकिल चलाते हुए देखते रहते थे। और, इसी दौरान एक दिन उनका सिर बालकनी की ग्रिल में फंस गया था। 

सचिन ने इस घटना का जिक्र पिछले दिनों प्रकाशित अपनी किताब प्लेइंग इट माई वे में किया है। सचिन किताब के पहले अध्याय चाइल्डहुड में लिखते हैं,मैं बचपन में काफी जिद्दी था। मेरे कई दोस्तों पर साइकिल थी और मैं भी साइकिल चाहता था। मेरे पिता को मुझे ना कहना अच्छा नहीं लगता था। मैंने जब उनसे कहा कि मुझे साइकिल चाहिए, तो उन्होंने मुझसे कहा कि कुछ दिनों में वह मुझे साइकिल दिला देंगे। आर्थिक तौर पर चार बच्चों को पालना बेहद मुश्किल होता है। किताब में सचिन ने लिखा है,बिना इस बात को जाने कि मेरे पिताजी को इसके लिए क्या करना होगा, मैं साइकिल की जिद पर अडा रहा और मैंने साइकिल न आने तक बाहर खेलने जाने से मना कर दिया। मैं सप्ताह भर बाहर खेलने नहीं गया। मैं बालकनी में ही खडा रहकर अपने दोस्तों को देखता था। किताब में सचिन ने लिखा है,एक दिन मैंने अपने माता-पिता को डराने वाला अनुभव दिया। हम चौथी मंजिल पर रहते थे, जिसकी बालकनी छोटी थी और उसमें ग्रिल थी। मैं उसके ऊपर से नहीं देख सकता था। इसलिए बाहर अच्छे से देखने के लिए मैंने ग्रिल में अपना सिर डाला। मैं अपना सिर उस ग्रिल में डालने में तो सफल रहा लेकिन, मैं उसमें सिर को बाहर नहीं निकाल पाया। मैं 30 मिनट तक उसमें फंसा रहा। मेरे घर वाले बेहद परेशान हो गए थे। काफी कोशिशों के बाद मेरी मां ने खूब सारा तेल डाल कर मेरा सिर उस ग्रिल में से बाहर निकाला। मेरी जिद को देखते हुए और इस बात के डर से कि मैं कहीं दोबारा ऎसा कुछ न कर बैठूं, मेरे पिता ने किसी तरह पैसे इकटा कर मुझे नई साइकिल खरीद कर दी। मैं अभी तक नहीं जानता कि उन्होंने साइकिल के लिए क्या किया था। सचिन हालांकि, ज्यादा देर तक साइकिल की खुशी नहीं बना पाए थे, क्योंकि साइकिल आने के कुछ घंटे बाद ही सचिन का साइकिल से एक्सीडेंट हो गया था। सचिन को चोटें लगी थी। उनके पिता ने उनसे कहा था कि जब तक वह पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाते तब तक साइकिल नहीं चलाएंगे। इस बार सचिन को अपने पिता की बात माननी पडी।  

साभार-khaskhabar.com

 

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