BREAKING NEWS

मीडियाभारती वेब सॉल्युशन अपने उपभोक्ताओं को कई तरह की इंटरनेट और मोबाइल मूल्य आधारित सेवाएं मुहैया कराता है। इनमें वेबसाइट डिजायनिंग, डेवलपिंग, वीपीएस, साझा होस्टिंग, डोमेन बुकिंग, बिजनेस मेल, दैनिक वेबसाइट अपडेशन, डेटा हैंडलिंग, वेब मार्केटिंग, वेब प्रमोशन तथा दूसरे मीडिया प्रकाशकों के लिए नियमित प्रकाशन सामग्री मुहैया कराना प्रमुख है- संपर्क करें - 0129-4036474

इच्छा मृत्यु होनी चाहिए या नहीं, आज आएगा सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

इच्छा मृत्यु होनी चाहिए या नहीं, आज आएगा सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसलानई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट आज इच्छा मृत्यु यानी पैसिव यूथेनेशिया पर अपना फैसला सुनाएगी। चीफ जस्टि दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने पिछले साल 11 अक्टूबर को इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। पांच जजों की बेंच आज इस बात पर फैसला सुनाएगी कि क्या किसी व्यक्ति ऐसी लिविंग विल को मान्यता दी जानी चाहिए, जिसमें वह अग्रिम रूप से बयान जारी कर यह निर्देश दे सकता है कि उसके जीवन को वेंटिलेटर या आर्टिफिशल सपॉर्ट सिस्टम पर लगाकर लंबा नहीं किया जाए। पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राइट टू लाइफ में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार शामिल है ये हम नहीं कहेंगे। 

 

कोर्ट ने कहा था कि हम ये कहेंगे कि गरिमापूर्ण मृत्यु पीडा रहित होनी चाहिए। कुछ ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए, जिसमें गरिमपूर्ण तरीके से मृत्यु हो सके। आपको बता दें कि केंद्र सरकार इच्छा मृत्यु का विरोध कर रही है। शीर्ष अदालत में इच्छा मृत्यु को लेकर याचिका दर्ज की गई थी जिसमें कहा गया था कि मृत्यु शैया पर लेटे हुए व्यक्ति को लाइफ सपोर्ट सिस्टम देकर जिंदा रखा जाए या फिर मरने दिया जाए। देश की शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए सवाल उठाया था कि किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखकर जीने को मजबूर कर सकते हैं? 

 

कोर्ट ने ये भी सवाल उठाया था कि जब सम्मान से जीने को अधिकार माना जाता है तो क्यों ना सम्मान के साथ मरने को भी अधिकार माना जाए। ऐसे में क्या इच्छा मृत्यु मौलिक अधिकार के दायरे में डाला जाएगा? आपको बता दें कि फरवरी 2015 में इच्छा मृत्यु से संबंधित याचिका को संवैधानिक खंडपीठ के पास भेजा था जिसमें ऐसे व्यक्ति की बात की गई थी जो गंभीर बीमारी से जूझ रहा है और मेडिकल ऑपनियन के मुताबिक उसके बचने की संभावना नहीं है। गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका पर तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सदाशिवम ने मामले को संज्ञान में लिया था जिसमें मांग की गई थी कि एक व्यक्ति जो घातक बीमारी से पीडि़त हो उसे मेडिकल सपोर्ट को हटाकर पीड़ा से मुक्ति दी जानी चाहिए

साभार-khaskhabar.com 

 

 

 

नारद संवाद

देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि

Read More

हमारी बात

स्वतंत्रता सेनानी पं. हुकम सिंह गौतम की पुण्यतिथि मनाई

Read More

Bollywood


विविधा


शंखनाद

पुरानी कहावत और नया भारत

Read More