देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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झांसी । जनपद में पानी का संकट गहराता जा रहा है। देखा जाए जितना बड़ा संकट सिंचाई का है उतना ही पेयजल का भी है। गांवों की स्थिति काफी दयनीय है, तस्वीर बदली हुई है। वहां ऐसा लगता है कि जैसे सूखा पड़ गया है, पानी के अभाव में लोगों के हलक सूख रहे हैं। रेगिस्तान जैसे हालात बनते जा रहे है। यहां तक लोगों पानी खरीदना तक पड़ रहा है। पेयजल की समस्या ने गरीब मजदूर वर्ग की दैनिक दिनचर्या को बदल कर रख दिया है। वैसे देखा जाए तो शहरी क्षेत्र में 3200 जल कनेक्शन और 2500 हैंडपंप पूरे क्षेत्र में हैं। जिसमें से लगभग 1200 हैंडपंप चालू हालत में है, 500 सौ के आसपास कंडम हो चुके तथा बाकी बचे में कुछ रिबोर और सुधरने की राह देख रहे हैं। वहीं, देखा जाए प्रचंड गर्मी लोगों को बेहाल कर रही है, परन्तु विभागीय अधिकारी आंकड़ों में जूझ रहे हैं।
पानी पर दबंगों का कब्जा
बुंदेलखंड में पेयजल बहुत बड़ी समस्या है। गर्मी के दिनों में ग्रामीण एवं शहरी पिछड़े क्षेत्र में पानी से ज्यादा अहम मुद्दा कुछ नहीं है। ग्राम करगुवा में पिछड़े क्षेत्र कैमासन पुरम में लोगों को पेयजल के लिए दो किलो मीटर तक जाना पड़ता है। इस क्षेत्र के लिए पूर्व में एक पानी की टंकी प्रस्तावित हुयी थी,जो योजना आज तक परवान नही चढ़ सकी। बस्ती में सरकारी हैंड पम्प है, लेकिन उन पर जंजीर और ताले जड़े हुए है। उस पर दबंगों का कब्जा है। ऐसा नहीं है कि नगर निगम के प्रशासन द्वारा व्यवस्था न की जाती हो, लेकिन शहर की सीमा से निकलते ही पानी के टैंकर दबंगों के हाथ में होता है। हैंडपंपों ने दे दिया जवाब
शहर में कई ऐसे मोहल्ले हैं जहां पर हैंडपंपों ने पानी देना बंद कर दिया है। सरकारी नल लगे हैं लेकिन उसमें पानी एक सप्ताह तक नहीं आता है। जब आता भी है तो सम्पन्न लोग मोटर लगा कर पानी टंकियों में भर लेते हैं, तथा नल का पानी आगे बढ़ ही नहीं पाता। फिलहाल नगर के मद्रासी कालोनी, उन्नाव गेट, लक्ष्मीगेट सागर गेट करगुवां जी गडिय़ागांव आदि में टैंकर से जलापूर्ति की व्यवस्था की गई है।
कोछाभांवर: आंदोलन का भी नहीं असर आज हालात पुराने जैसे
मेडिकल कांलेज कानपुर रोड पर कोछाभावर गांव है। गांव के कुएं सुख गए है, जल स्तर काफी नीचे चला गया है, जो कुछ हैण्ड पम्प है वो खारा पानी देते है। कोछा भांवर में सरकारी वयवस्था को ठेंगा दिखाते हुए निजी/ प्राइवेट पानी की पाइप लाइन बिछाई गयी है। यहां पर पानी लोगों को बेचा जाता है। प्रति माह 400 से 500 सौ रूपये वसूले जाते है, दबंगई के चलते यहां उधारी की गुंजाईश नहीं है। यह बड़ा आश्चर्य का विषय है कि किस तरह से प्राकृतिक संसाधन पर कुछ लोगो का दबदबा और कब्जा है। वहीं, दूसरी ओर शहर से शिवपुर रोड पर स्थिति गांव रक्सा में भी हालत बदहाल है। यहां पर भी लोग पानी रुपये देकर खरीदते हैं। योजनाएं करोड़ों की, धरातल पर कुछ भी नहीं
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कैबिनेट बैठक में बुंदेलखंड में पेयजल समस्या के समाधान पर जोर दिया। कैबिनेट ने बुंदेलखंड की स्थिति देखते हुए पेयजल योजना समयबद्ध ढंग से पूरा करने का निर्णय लिया। मंत्री डॉ. महेंद्र सिंह को बुंदेलखंड और नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना को शहरी अंचलों में प्रवास कर प्रभावी कदम उठाने की जिम्मेदारी दी गई है। पेयजल संकट दूर करने के लिए नलकूप लगाने और रीबोरिंग से लेकर टैंकर की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया। वहां के ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु में पेयजल समस्या के समाधान के लिए पीएलए में रखी 47.36 करोड़ रुपये की धनराशि के सापेक्ष 47.03 करोड़ रुपये की कार्ययोजना पर अमल किया जाएगा। इसमें 31.80 करोड़ रुपये की लागत से बुंदेलखंड के सात जिलों में पहले से स्थापित 3815 हैंडपंपों की रीबोरिंग तथा 8.75 करोड़ रुपये की लागत से 1,174 नए हैंडपंपों का अधिष्ठापन कराया जाएगा। इस प्रकार इन दोनों कार्यों के लिए कुल 40.55 करोड़ रुपये धनराशि की कार्ययोजना प्रस्तुत की गयी, जिसे मंत्रिपरिषद ने मंजूरी प्रदान कर दी। बुंदेलखंड के सातों में उप्र जल निगम द्वारा संचालित पाइप पेय जल योजनाओं को पूरी क्षमता पर क्रियाशील करने के लिए आवश्यकतानुसार नलकूप के निर्माण, खराब नलकूपों की रीबोरिंग, पंप एवं पाइप लाइन आदि कार्यों की मरम्मत के लिए 6.84 करोड़ रुपये की कार्ययोजना पर भी सहमति प्रदान कर दी गई। वहीं दूसरी ओर देखने आ रहा है कि यह योजनाएं धरातल पर सिफर हैं।
साभार-khaskhabar.com













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