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शीतला माता की उपासना का पर्व ‘थदड़ी’: सिंधी समाज ने घरों में नहीं जलाया चूल्हा, ठंडे व्यंजनों का लगाया भोग

जयपुर। राजधानी जयपुर में सिंधी समाज का पारंपरिक और आस्था से जुड़ा पर्व ‘थदड़ी’ श्रद्धा एवं धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर सिंधी समाज की महिलाओं ने नए वस्त्र धारण कर मंगल गीत गाते हुए भगवान श्री झूलेलाल मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने मां शीतला से परिवार के उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना की। एक दिन पहले तैयार किए जाते हैं विशेष पकवान थदड़ी पर्व की सबसे खास परंपरा यह है कि इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता। पर्व के लिए आवश्यक मीठे और नमकीन व्यंजन एक दिन पहले ही तैयार कर लिए जाते हैं। शीतला माता को पहले से बने ठंडे व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है, जिसके बाद परिवार के सदस्य इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
इस अवसर पर सिंधी समाज के पारंपरिक व्यंजन खोरक, चोपा, मीठी मानी, टिक्की, खीरोणी और पकोड़ी विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। इन पारंपरिक पकवानों से घरों में पर्व का अलग ही उत्साह देखने को मिलता है।
शांति, संयम और आरोग्य का संदेश देता है पर्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार थदड़ी केवल ठंडे भोजन का पर्व नहीं है, बल्कि यह जीवन में शांति, संयम और सकारात्मकता अपनाने का संदेश भी देता है। इस दिन श्रद्धालु क्रोध, घमंड, ईर्ष्या और नकारात्मक विचारों को त्यागकर प्रेम, सद्भाव और पारिवारिक एकता बनाए रखने का संकल्प लेते हैं।
मान्यताओं के अनुसार इस पर्व का संबंध आरोग्य, स्वच्छता और संक्रामक रोगों से बचाव की परंपराओं से भी जोड़ा जाता है। शीतला माता की उपासना के माध्यम से परिवार के स्वस्थ और सुखी जीवन की कामना की जाती है। थदड़ी का पर्व सिंधी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक आस्थाओं को आज भी जीवंत बनाए हुए है।


साभार-khaskhabar.com

 

 

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