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पंचायत चुनावः आरक्षण से हुआ इतना कि लडेंगे नहीं, अब लडाएंगे

मथुरा। राजनीति का खेल ही निराला है। राजनीतिक के मझे हुए खिलाडी कभी हार नहीं मानते हैं। आरक्षण सूची जारी होने के बाद कई दावेदार इस बार चुनाव नहीं लड सकेंगे। एक बारगी ऐसा लगता है कि वह इस बार सिर्फ मतदाता बन कर रहेंगे, लेकिन यह सच नहीं है। लगातार दावेदारी पेश करते रहे राजनीतिक दंगल के तगडे दावेदार इतने भर से चुप नहीं बैठते ये दावेदार चुनाव लडेंगे नहीं बल्कि लडाएंगे। खर्चा भी यही करेंगे फर्क सिर्फ इतना है कि पर्चा इनकी जगह को दूसरा भरेगा। बुधवार को त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर आरक्षण सूची जारी कर दी गई। इसी के साथ यह तय हो गया है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में किसी वार्ड और ग्राम पंचायत से कौन प्रत्याशी चुनाव लड सकता है और कौन चुनाव नहीं लड सकेगा। आरक्षण सूची जारी होने के बाद वहीं कुछ बडी ग्राम पंचायतों में आरक्षण सूची ने दावेदारों का पूरा खेल ही बिगाड कर रख दिया है। हालांकि लोकतंत्र में यह देखना भी बेहद रोचक होता है कि जो दावेदार आरक्षण प्रक्रिया के चलते चुनाव मैदान से बाहर हो जाते हैं अप्रतक्षरूप से फिर भी चुनाव वही लडते हैं। नाक का सवाल उन्हीं का होता है और साख भी उन्हीं की दांव पर होती है। चुनाव भी वही लडते हैं यहां तक कि तमाम जगहों पर खर्चा भी वही करते हैं सिर्फ पर्चा भरने वाला बदल जाता है। इसके बाद प्रधानी भी वही करते हैं। इसे महिला प्रधानों के उदाहरण बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। महिलाओं के लिए जिन आरक्षित सीटांे पर महिलाएं जीतती हैं वहां प्रधानी ही नहीं जिला पंचायत सदस्य और ब्लाॅक पंचायत सदस्य के रूप मंे पूरी तरह से पुरूष ही काम करते हैं। यहां तक कि तमाम लोगों को अपनी महिला प्रधान तक का नाम अपनी ही ग्राम पंचायत में पता नहीं होता है।  
   हालांकि महिला और पुरूष वर्ग को लेकर भी आरक्षण लगू किया गया है लेकिन इससे ज्यादा फर्क धरातल पर देखने को नहीं मिल रहा है। महिला के लिए आरक्षित हुई सीटों पर सिर्फ इतना हुआ है कि जहां व्यक्ति अपने नाम से नामांकन कर रहे थे वह अब अपनी पत्नी के नाम से नामांकर दाखिल करेंगे। बाकी की तैयारी और दूसरे चुनावी प्रयास जस के तस रहने जा रहे हैं। वहीं जनपद में ऐसी ग्राम पंचायतें बहुतायत में हैं जहां सिर्फ अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने पर ही प्रधान पद के लिए इस वर्ग से लोग मैदान में उतरते हैं। कई ग्राम पंचायतों में वर्षों बाद एसी कोटे से कोई प्रधान चुना जाएगा। वहीं कुछ ग्राम पंचायतों में सिर्फ महिला प्रत्याशी एक बार फिर चुनाव मैदान में होंगी। जहां सामन्य महिला अथवा ओबीसी, बीसी महिला अथवा एसी महिला सीट थी वहां एक बार फिर आरक्षण प्रक्रिया में वर्ग बदला गया है सीट लगातार दूसरी बार महिला कोटे में रही है। यहां से दावेदारी में जुटे प्रत्याशी फिर से लेडी लक पर भरोसा जताएंगे।

नारद संवाद

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