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प्रयोगः किसान आंदोलन से लौट रहा ’पंचायतों का दौर’

मथुरा। तीन कृषि कानूनों की खिलाफत में चल रहा किसान आंदोलन राजनीतिक ही नहीं सामाजिक समीकरणों को भी प्रभावित कर रहा है। गांव देहात में इस आंदोलन का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर पंचायत शब्द बहुतायत से प्रचलन में आ गया है। विशाल जनसभाओं को पंचायत और महापंचायत के नाम से प्रचारित किया जा रहा है। इसके अलावा गांव देहात में पंचायतों का नया दौर शुरू हो गया है।
 आंदोलन ने किसानों के साथ-साथ जातीय पंचायतों के सरकार के खिलाफ हो जाने के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। किसान आंदोलन से मथुरा में भी पहली बार हरियाणा की तर्ज पर खाफ पंचायत जैसे प्रयोग को जन्म दिया है। पहली बार किसान आंदोलन को समर्थन देने के लिए खाफ पंचायतों का आयोजन शुरू हुआ है। बल्देव में हुई किसान पंचायत जनसमर्थन जुटाने के लिए हुआ इसी तरह का प्रयोग था। खूंटैल पट्टी की आठ फरवरी को होने वाली पंचायत भी इसी तरह का एक प्रयोग है। इससे पहले बाजना क्षेत्र में मोरकी इंटर काॅलेज मैदान पर भी किसान पंचायत खाफ पंचायत की तर्ज पर ही आयोजित की गई थी।
पंच पंचायत करते रहे बुजुर्गों का मानना है कि हालांकि मथुरा और आसपास के जनपदों में अभी खाफ पंचायत को स्वरूप मिलने में समय लगेगा। बछगांव निवासी रामभरोसे कहते हैं कि यहां किसी पट्टी या खाफ का अभी तक कोई सर्वमान्य मुखिया नहीं है। जबकि हरियाण में हर खाफ का अपना मुखिया है। राकेश टिकैत के बडे भाई नरेश टिकैत भी अपनी खाफ के चैधरी हैं। मथुरा में सर्वखाफ के नाम पर बल्देव की पंचायत को प्रचारित किया गया लेकिन यह सर्वखाफ की बजाय सर्वजातीय पंचायत थी।
प्रथ्वी सिहं बताते हैं पंचायत से ही गांव चलते थे। सर्वमान्य मुख्यिा हर गांव का होता था। अपने मुख्यिा के प्रति लोगों की आस्था होती थी। यह राजनीतिक जोड घटाव से कहीं मजबूत गठबंधन होता था। मुजफ्फरनगर, मथुरा और बागपत की पंचायतों में उमड़ी किसानों की भारी भीड़ इसी बदलाव का संकेत भी दे रही है। तीन कृषि कानूनों को लेकर सरकार के खिलाफ लगातार किसानों का आंदोलन तेज होता जा रहा है। किसान आंदोलन की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। जगह जगह हो रहीं पंचायतों ने किसानों के साथ साथ राजनीतिक दलों को लेकर बने जातीय समीकरणों को भी बदलना शुरू कर दिया है। यहां तक कि निजीकरण के विरोध में सरकार की नीतियों की मुखालफत करते रहे सरकारी कर्मचारियों के संगठन भी किसान आंदोलन को समर्थन देकर सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

 

नारद संवाद

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