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पवित्र नदियों को लौटाएं अतीत का गौरव

रविवार को सिर्सी में सैकड़ों लोग, पर्यावरण कार्यकर्ता और बड़े-बड़े संत एकजुट हुए। सबने एक साथ मांग की कि नदियों को भी "जीने का अधिकार" मिलना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे इंसानों को संविधान में अधिकार मिले हैं। उन्होंने कहा कि नदियों का प्राकृतिक बहाव बिना रुकावट के बना रहे, इसके लिए कानून बनना चाहिए। यह रैली मारिकांबा मंदिर के मैदान में हुई। करीब 500 लोग आए थे ,  किसान, आदिवासी, छात्र और पर्यावरण प्रेमी। सब तख्तियाँ लिए थे जिन पर लिखा था : "नदियों को भी अधिकार चाहिए" और "हमारी जीवन रेखा बचाओ"। कई बड़े संतों ने भाषण दिए, जैसे कुक्के सुब्रह्मण्य मठ के स्वामी विद्यादीश तीर्थ। उन्होंने कहा, "नदियाँ सिर्फ पानी नहीं हैं, ये धरती माँ की नसें हैं। इंसानों को जीने का हक है, तो नदियों को भी उनका प्राकृतिक रूप में जीने का हक मिलना चाहिए।" पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी बात रखी। डॉ. अंजलि पाटिल ने कहा कि नदियों को कानूनी रूप से "जीवित व्यक्ति" का दर्जा मिलना चाहिए। जैसे न्यूजीलैंड में व्हंगनुई नदी को अधिकार मिले हैं। उन्होंने माँग की:
- नदियों का प्राकृतिक बहाव बिना रुकावट चले
- बाँध और प्रदूषण से बचाव
- नदियों के लिए कोर्ट में पैरवी करने वाले लोग हों
- नियम तोड़ने पर सख्त सजा
किसान राजू गौड़ा ने बताया, "हमारी नदियाँ सूख रही हैं, फसलें खराब हो रही हैं। नदियों को अधिकार मिलेंगे तो हमारा भविष्य भी बचेगा।"रैली में लोक गीत गाए गए और सबने नदियों की रक्षा की शपथ ली। आयोजकों ने कहा कि वे इस प्रस्ताव को कर्नाटक के मुख्यमंत्री और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री को भेजेंगे।
यह रैली दिखाती है कि लोग अब नदियों को सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा मानते हैं। अगर ऐसा कानून बना तो भारत में नदियों की सुरक्षा के लिए बड़ा बदलाव आ सकता है। नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, हमारी संस्कृति, सभ्यता और जीवन की धमनियाँ हैं। दुर्भाग्य से आज यमुना जैसी पवित्र नदी घोर उपेक्षा और प्रदूषण की शिकार है। कभी निर्मल और जीवनदायिनी रही यमुना आज नालों का रूप ले चुकी है। ताजमहल के पार्श्व में बहने वाली यह नदी अब काली पड़ चुकी है, एक ऐसा दृश्य जो हमारी सभ्यता की लाज को ठेस पहुँचाता है। रिवर कनेक्ट कैंपेन आगरा वर्ष 2014 से इस बेकद्री को उजागर करने और समाज को झकझोरने के लिए संघर्षरत है।  माँगें स्पष्ट हैं: यमुना की सफाई, ड्रेजिंग, डी-सिल्टिंग, ताजमहल के नीचे बैराज का निर्माण और नदी की खोई हुई महिमा का पुनरुद्धार। इसी संकल्प के साथ एक्टिविस्ट्स रोजाना एत्मादुद्दौला व्यू पॉइंट पार्क में यमुना आरती आयोजित करते हैं। यह आरती केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नदी संरक्षण का जनआंदोलन है। संदेश स्पष्ट है, नदियों को पूजना ही नहीं, बचाना भी होगा। यह आंदोलन आज भी जारी है और हर नागरिक की भागीदारी की पुकार है। भारत की नदियाँ राष्ट्र की जीवनरेखाएँ हैं। इन्हें बचाना हमारा संवैधानिक कर्तव्य भी है। आगरा, जो ताज की नगरी है, यमुना को मरणासन्न होते देखे बिना चुप नहीं रह सकता। पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "हम आप सभी से अपील करते हैं, जनप्रतिनिधियों से नीतिगत समर्थन, नीति-निर्माताओं से ठोस कदम और आम नागरिकों से सक्रिय सहभागिता की माँग करते हैं। आइए, मिलकर यमुना को फिर से स्वच्छ और जीवंत बनाएँ।"

नारद संवाद

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