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आध्यात्म : तनाव से मुक्ति के लिए वरदान

हम सभी के जीवन में अनेक प्रकार की समस्यऐं सदैव आती जाती रहती हैं और उनके समाधान भी होते रहते हैं। यह एक सामान्य बात है। परंतु आज समस्त मानव जाति के सामने कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का जो  संकट आकर खड़ा हुआ है वह अपने आप में बहुत ही कष्टदायक और भयभीत करने वाला विषय है।चारों ओर त्राहि त्राहि मची हुई है। 


आज पूरी दुनिया में इस महामारी ने लाखों लोगों की जीवन लीला को समाप्त कर दिया है। चारों और मौत का ताँडव दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है। अभी न जाने ये क्रम कब और कहाँ जाकर रुकेगा इस बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। इस महामारी का संक्रमण इतनी तेज़ गति से फैल रहा है कि उसके सामने पूरी दुनिया की सारी व्यवस्थाऐं चौपट हो चुकी है। पूरी दुनिया इसके सामने असहज सी दिखाई पड़ रही है। अब तो जब तक कोई वैक्सीन इसके निदान लिए नहीं बनती है तब तक आम जनमानस के मन में मौत का डर दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है, और चारों ओर पूरी दुनिया में तनाव का वातावरण व्याप्त है। “ बहुत ही निर्दयीता के साथ मौत अपना ताँडव कर रही है। “ अब यहाँ पर एक बात ध्यान देने योग्य है कि आज हम सबको मिलकर इस वैश्विक महामारी का डटकर मुक़ाबला करना होगा। 

 

हमने यह बात हमारे पूर्वजों से ही सीखी है कि जीवन में कभी भी मुसीबत के समय में हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और ना ही अपने ईश्वर को भूलना चाहिए। हमारे लोकाचार में एक पुरानी कहावत है कि  “हारिये ना हिम्मत और बिसारिये ना राम” यानि जीवन में चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियाँ आ जायें हमने कभी भी हिम्मत नहीं हारनी है और ना ही कभी भी अपने ईश्वर को भूलना है। हमें सदैव नेकी के रास्ते पर चलते हुए आगे बढ़ना है और इस बात का ख़्याल रखना है कि ये पूरी दुनिया उस ईश्वर की बनायी हुई है जो हम सबका सृजनहार भी है और पालनहार भी है। उसकी मर्ज़ी के बिना यहाँ पर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है। सब कुछ करने वाला तो वही है, हमें तो केवल नेकी के रास्ते पर चलना है। इसीलिये परोपकार की भावना को अपने ह्रदय में रखकर शुभ कर्म करते हुए आगे बढ़ना हैं। 


फिर भी यहाँ पर हम एक बात आपसे बहुत ही ईमानदारी के साथ कहना चाहते हैं कि जीवन में शुभ कर्म करने के लिये आपका ह्रदय निर्मल होना चाहिये और आपकी चित्तवृतियाँ पवित्र होनी चाहियें। लेकिन यह तभी सम्भव है जब हमारा आध्यात्मिक बल बहुत ही उच्चकोटि का हो। हम अपने आध्यात्मिक बल को मजबूत बनाकर तनाव से कैसे मुक्ति पा सकते हैं यही इस लेख का मुख्य बिन्दु है। अब सबसे पहले हम ये जान लें कि आध्यात्म है क्या? और उसको किस प्रकार के उपायों से शक्तिशाली बनाया जा सकता है। सही मायनों में मन को आत्मा के साथ जोड़ना ही आध्यात्म है।


अब बात करते हैं कि मन को आत्मा के साथ कैसे जोड़ा जाये जिससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति निरन्तर रूप से होती रहे? हमें इस बात का भी विशेष धान रखना होगा कि हम संसार के तीनों तापों को (दैहिक,दैविक और भौतिक) जीतकर अपने इस जीवन को तनाव मुक्त कैसे बनायें? हमें चाहिये कि हम निरन्तर एक सकारात्मक सोच के साथ नये से नये आयामों की स्थापना करते हुए ऐसे कार्य करें कि जिससे हमारा ये छोटा सा जीवन सही मायनों में सफलता की ओर अग्रसर होता रहे। 


हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है कि मनुष्य की श्रेष्ठता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति का आध्यात्मिक बल जितना उच्च श्रेणी का होगा वह व्यक्ति उतना श्रेष्ठ भी होगा। लेख के अंतिम पड़ाव में अब हम इस बात केन्द्रित रहेंगे कि अपने आध्यात्मिक बल को बढ़ाने के लिये हमें क्या-क्या उपाय करने चाहियें। आईये अब हम उन उपायों पर विस्तार से चर्चा करें। 


1. दिनचर्या: हमारी दिनचर्या बहुत ही अनुशासित और संयमित होनी चाहिये। हमें रात्री में जल्दी सोना चाहिये और सुबह ब्रह्म मुहूर्त, जिसे अमृत बेला कहते हैं, में ही जागना चाहिये। क्योंकि उस समय की प्राण वायु हमारे शरीर को अद्भुत ऊर्जा और कांति प्रदान करती है। इस अमृतवेला में कम से कम एक घंटे का मॉर्निग-वॉक करना बहुत ही ज़रूरी है.


1. योगा, प्रणायामऔर स्वाध्याय ये ऐसी अद्भुत क्रियायें हैं जिनके करने से हमारे शरीर में नयी ऊर्जा का संचार होता है। इसके साथ-साथ हमारे रक्त की शुद्धि भी होती है और श्वेत रक्त कणिकाएँ ज्यादा मात्रा में बनती हैं जिनसे हमारा शरीर की रोगों से सडने की क्षमता (एम्युनिटी सिस्टम) मज़बूत होती है।  


2. खानपान:- निश्चित रूप से हमारा खानपान सात्विक, रुचिकर और पौष्टिक होना चाहिये, और इस बात का विशेष ध्यान रखें कि ये अपने निश्चित समय पर ही हो। भोजन के  बनाते  समय और खाते समय दोनों वक्त स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिये। 


3. संगीत:- संगीत में वो जादू है जो तनाव से तो मुक्ति दिलाता ही है साथ ही साथ ये मानसिक रोगों से निजात दिलाने में भी बहुत सहायक है। संगीत के माध्यम से तो हमारे ऋषि मुनियों ने भी सिद्धियाँ प्राप्त की है। इस संदर्भ संत हरिदास जी का उदाहरण हमारे समक्ष यगों-युगों है। 


4. ईश्वरीय उपासना और ध्यान:- यह तो सर्वश्रेष्ठ मार्ग कहा गया है। यह मार्ग केवल तनाव से ही मुक्ति नहीं दिलाता बल्कि संसार के तीनों तापों से बन्धन मुक्त कर देता है। यह अद्भुत भी है और अलौकिक भी। जब हम घर में पूजा करने के स्थान पर एकान्त में बैठकर पूर्ण समर्पण के साथ अपने इष्टदेव का ध्यान करते हैं, उनकी कथाओं का उनकी लीलाओं का मनन करते हैं तो कई बार ध्यान करते-करते उस परमात्मा के प्रेम में शरीर पुलकित हो जाता है। इसी कारण नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती है। तब ये जान लीजिये कि यही वो सुखद क्षण हैं जब मन पूर्ण रूप से ईश्वर की शरण में पहुँचने का अथक प्रयास कर रहा होता है। यह संतजनों ने भी कहा है और लेखक का निजि रूप से अनुभव भी है। मंत्रों के जाप की यदि हम बात करें तो उनका अपना बहुत ही अलौकिक प्रभाव है। चाहे आप राम मंत्र का जाप करें, चाहे आप गायत्री मंत्र का जाप करें और चाहे आप प्रणव(ॐ)का जाप करें। सभी मंत्रों की शक्तियाँ अपने आप में अपरिमित और अतुलनीय हैं, उनके जप करने से जो अद्भुत परिणाम मिले हैं वो अपने आप में अलौकिक हैं। अब तक ना जाने कितने ही ऋषिमुनियों ने इन मंत्र शक्तियों के बल पर अनेक प्रकार की ऋिद्धि सिद्धियों को प्राप्त करके जन कल्याण के कार्य किये हैं।अबआप भी आगे आयें और इन उपरिलिखित उपायों का अपने जीवन में प्रयोग करके अपने आध्यात्मिक बल को बढ़ाकर तनाव मुक्त और मानवता से परिपूर्ण जीवन जीने की कला सीखें। मानवता अपने आप में एक मंत्र भी है और एक यज्ञ भी। आप अपने जीवन पथ पर निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर हों यही हमारी शुभकामनाएँ हैं।

 

भगवत प्रशाद शर्मा 
गलगोटियास विश्वविद्यालय 
ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश

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