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इस साल के आखिर तक 74 रुपये प्रति डॉलर तक लुढक़ सकती है देसी करेंसी

मुंबई। देश की अर्थव्यवस्था के हालात को लेकर बनी अनिश्चिता के माहौल के बीच घरेलू शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली के दबाव से रुपये में लगातार कमजोरी देखी जा रही है। डॉलर के मुकाबले रुपया शुक्रवार को लुढक़ कर 72 रुपये प्रति डॉलर से नीचे आ गया जोकि इस साल का सबसे निचला स्तर है। बाजार विश£ेषकों की माने तो मौजूदा घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए रुपये में और कमजोरी बढऩे की संभावना है और देसी करेंसी 74 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़ सकता है। 

इस साल की शुरूआत में घरेलू इक्विटी और डेब्ट बाजार में डॉलर की आमद बढऩे के कारण रुपये में जबरदस्त मजबूती रही, लेकिन अब विपरीत स्थिति पैदा हो गई है। इसके अलावा, कच्चे तेल के दाम में नरमी रहने से भी रुपये को सपोर्ट मिला क्योंकि तेल का दाम बढऩे से आयात के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत होती है। 

कार्वी कॉमट्रेड लिमिटेड के सीईओ रमेश वरखेडकर ने आईएएनएस को बताया कि कुछ समय पहले दुनिया में भारत को सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थवस्था के रूप में देखा जाता था और देश में स्थिर सरकार बनने की संभावना पहले से ही जताई जा रही थी जिससे विदेशी निवेशक भारत की ओर आकर्षित हुए। 

इस साल जून में व्यापार घाटा पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले घटकर 15.28 अरब डॉलर रहा। पिछले साल जून में देश का व्यापार घाटा 16.60 अरब डॉलर था। मगर निर्यात और आयात दोनों में गिरावट आने से देशी अर्थव्यस्था की सेहत को लेकर आशंका जताई जाने लगी और अब नीति निमार्ता भी मानने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था से सेहत खराब है। 

रमेश ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव तकरीबन सपाट रहने के बावजूद अगस्त में रुपये में चार फीसदी की गिरावट आई क्योंकि जुलाई से लेकर अगस्त में अब तक विदेशी पोर्टपोलियो निवेशकों ने 13,000 करोड़ रुपये की निकासी की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में जल्द कोई सुधार की उम्मीद नहीं दिख रही है, ऐसे में दिसंबर तक देसी करेंसी 74 रुपये प्रति डॉलर के स्तर का तोड़ सकता है। 

एंजेल ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट ( इनर्जी व करेंसी रिसर्च) अनुज गुप्ता भी रुपये में और कमजोरी बढऩे की संभावना जता रहे हैं, लेकिन उनका मानना है कि चालू वित्त वर्ष की चैथी तिमाही में रुपया 74 के मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़ सकता है। 

पिछले साल अक्टूबर मे देसी करेंसी 74.47 रुपये प्रति डॉलर के ऊंचे स्तर पर चला गया था। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मई 2014 में रुपया का निचला स्तर 58.33 रुपये प्रति डॉलर था। 

अनुज गुप्ता के अनुसार, रुपये में कमजोरी की मुख्य वजह घरेलू अर्थव्यवस्था में मंदी की आहट और विदेशी निवेशकों का निराशाजनक रुझान है जिसके कारण वे भारतीय बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं जिससे निफ्टी छह महीने के निचले स्तर पर आ गया है। 

गौरतलब है कि आम बजट में दौलतमंद आयकरदाताओं पर सरचार्ज बढ़ाए जाने का एफपीआई पर नराकात्मक असर हुआ और वे अपना पैसा निकालने लगे। 

गुप्ता ने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार से वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती के कारण एशियाई करेंसी में लगातार गिरावट देखी जा रही है जबकि अमेरिकी डॉलर में मजबूती आने से डॉलर इंडेक्स उंचा उठा है। डॉलर इंडेक्स दुनिया की छह प्रमुख देशों की मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की ताकत का सूचक है। 

साभार-khaskhabar.com

नारद संवाद

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