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आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी का मिला प्रमाण पत्र लेने से भी कर दिया था इनकार

मथुरा। नौजवान पीढ़ी को यह जानना जरूरी है कि देश सेवा और समाज सेवा की कोई कीमत नहीं होती। जिन देशभक्तों ने इस उक्ति को  सच साबित किया उनमें फिरोजाबाद के स्व. रतन लाल बंसल का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।


रतन लाल बंसल के सुपुत्र पत्रकार डा.अशोक बंसल ने बताया कि स्वत्रंत्रता सैनानी, लेखक एवं पत्रकार  स्व. रतन लाल बंसल का जन्म  सन 1919 में फिरोजाबाद में एक साधारण परिवार में हुआ था। डा.अ शोक बंसल मथुरा में मानस नगर काॅलोनी में रहते हैं। वह लम्बे समय तक शहर की प्रतिष्ठित शिक्षण संस्था बीएसए काॅलेज में प्रोफसर रहे। सेवानिर्वत होने के बाद कई सामाजिक और साहित्यक संस्थाओं के माध्यम से कान्हा की नगरी की सेवा कर रहे हैं। डा.आशोक बसंल की भी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुके हैं। भारत आष्ट्रेलिया पर भी उनकी एक पुस्तक का आष्ट्रेलिया में विमोचन हो चुका है।


डा.आशोक बसंल कहते हैं कि उनके पिता जी के सिर पर दादाजी का साया न होने के कारण उनकी प्रारम्भिक शिक्षा न हो सकी। फिरोजाबाद के पुरानी मंडी मोहल्ले में लम्बे समय तक निवास रहा। यह सुखद संयोग रहा कि इसी इलाके में  पत्रकार शिरोमणि दादा बनारसी दास चतुर्वेदी का निवास था। नौजवान रतन लाल को दादाजी के सम्पर्क में आने का अवसर मिला और पढ़ने लिखने की प्रेणना मिली। दादाजी कलकत्ता में श्श्विशाल भारत श्श् के सम्पादक थे। श्री रतन लाल बंसल ने एक कहानी लिखी तो दादाजी ने इसे विशाल भारत में प्रकाशित किया और पारिश्रमिक भी मिला। इससे उनका उत्साहवर्धन हुआ और अपनी जीविका के लिए लेखन प्रारम्भ किया। 1942 के भारत छोडो आंदोलन में वे जेल चले गए, तीन माह की सजा आगरा की सेन्ट्रल जेल में  काटी। इसके साथ ही कई बार उन्हें अंग्रेजी हूकूमत ने नजरबंद भी किया। आजादी के बाद स्वतंत्रता सैनानी का प्रमाण पत्र मिला तो यह कह कर वापस कर दिया कर दिया कि देश सेवा के लिए पुरूस्कार की आकांक्षा गलत है। श्री बंसल जीवन भर कलम के सिपाही रहे। श्री बंसल के  लेखन का विषय स्वाधीनता आंदोलन, क्रांतिकारी साहित्य, नारी मुक्ति और इतिहास प्रमुख रहा । उन्होंने  साम्प्रदायिकता के विरुध्द कलम चलाई और अनेक लेख  लिखे और पुस्तिकाएं छापी। अंधविश्वासों के खिलाफ अलख जगाया और नारी मुक्ति के पक्षधर बन अनेक लेख  लिखे। सरिता ने इन लेखों को प्रमुखता से छापा। इन लेखों के पक्ष और समर्थन में देश भर में प्रतिक्रियाएं हुईं। तभी महात्मा गाँधी ने बुलावा भेजा। गांधी के निकट रहे प.सुंदरलाल के साथ उनके द्वारा प्रकाशित अखबार नया हिन्द में एक लेखक के रूप में कार्य किया। दिल्ली में लम्बे  वक्त तक  निवास रहा। दिल्ली में समय समय पर समाचार पत्र और पत्रिकाओं का सम्पादन किया और आजादी के परवानों के त्याग और तपस्या को रेखांकित करती प्रदर्शनियों का आयोजन किया। एक साप्ताहिक पत्र देश की पुकार भी निकाला। अमर शहीद भगत सिंह स्मारक समिति का गठन कर क्रांतिकारी आंदोलन की बारीकियों और अनछुए पहलूओं पर शोध कार्य किया और स्वाधीनता विशेषांक प्रकाशित किये। प्रसिद्ध कहानीकार पांडेय बेचन शर्मा ’उग्र’ की स्मृति में हास्य व्यंग की सालाना पत्रिका ठिठोली का संपादन किया। वे आत्मप्रचार से  सदैव दूर रहे। आखिरी पुस्तक चंदवार और फिरोजाबाद का प्राचीन इतिहास थी। इसका  विमोचन फिरोजाबाद के पीडी जैन इंटर कालेज में पूर्व मंत्री  कर्ण सिंह ने किया था। इतिहास के एक अनछुए पृष्ठ को उजागर करती इस पुस्तक तीन संस्करण प्रकाशित हुए। यह पुस्तक फिरोजाबाद से छह किलोमीटर दूर चंदवार नामक प्रचीन स्थल के बारे में है जहां मोहम्मद गौरी और जयचंद का युद्ध हुआ था और इस युध्द में जयचंद मारा गया था। यह स्थल इतिहासकारों और पुरातत्ववेताओं की नजरों से आज भी ओझल है। इस पुस्तक पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बुलंदी खंडहरों की का निर्माण भी किया गया है। सन 1989 में रतन लाल बंसल का निधन हुआ।


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