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एक विलक्षण स्वतंत्रता सेनानी : स्व. रतन लाल बंसल जिन्होंने देशसेवा की कीमत नहीं वसूली

नौजवान पीढ़ी को यह जानना जरूरी है कि देश सेवा और समाज सेवा की कोई कीमत नहीं होती। जिन देशभक्तों ने इस उक्ति को सच साबित किया उनमें फिरोजाबाद के स्व ० रतन लाल बंसल का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। स्वत्रंत्रता सैनानी, लेखक एवं पत्रकार स्व० श्री रतन लाल बंसल का जन्म  सन १९१९ में फिरोजाबाद में एक साधारण परिवार में हुआ था। पिता का साया न होने के कारण प्रारम्भिक शिक्षा न हो सकी। फिरोजाबाद के पुरानी मंडी मोहल्ले में लम्बे समय तक निवास रहा। यह सुखद संयोग रहा कि इसी इलाके में पत्रकार शिरोमणि दादा बनारसी दास चतुर्वेदी का निवास था। नौजवान रतन लाल को दादाजी के सम्पर्क में आने का अवसर मिला और पढ़ने -लिखने की प्रेणना मिली। दादाजी कलकत्ता में ''विशाल भारत '' के सम्पादक थे। श्री रतन लाल बंसल ने एक कहानी लिखी तो दादाजी ने इसे 'विशाल भारत' में प्रकाशित किया और पारिश्रमिक भी मिला। इससे उनका उत्साहवर्धन हुआ और अपनी जीविका के लिए लेखन प्रारम्भ किया। १९४२ के' भारत छोडो आंदोलन' में वे जेल चले गए, तीन माह की सजा आगरा की सेन्ट्रल जेल में काटी। इसके साथ ही कई बार उन्हें अंग्रेजी हूकूमत ने नजरबंद भी किया। आजादी के बाद स्वतंत्रता सैनानी का प्रमाण पत्र मिला तो यह कह कर वापस कर दिया कर दिया कि देश सेवा के लिए पुरूस्कार की आकांक्षा गलत है। श्री बंसल जीवन भर कलम के सिपाही रहे। श्री बंसल के लेखन का विषय स्वाधीनता आंदोलन, क्रांतिकारी साहित्य ,नारी मुक्ति और इतिहास प्रमुख रहा। उन्होंने  साम्प्रदायिकता के विरुध्द कलम चलाई और अनेक लेख लिखे और पुस्तिकाएं छापी। अंधविश्वासों के खिलाफ अलख जगाया और नारी मुक्ति के पक्षधर बन अनेक लेख लिखे। ''सरिता'' ने इन लेखों को प्रमुखता से छापा। इन लेखों के पक्ष और समर्थन में देश भर में प्रतिक्रियाएं हुईं। तभी महात्मा गाँधी ने बुलावा भेजा। गाँधी जी के निकट रहे प ० सुंदरलाल के साथ उनके द्वारा प्रकाशित अखबार ''नया हिन्द '' में एक लेखक के रूप में कार्य किया। दिल्ली में लम्बे वक्त तक  निवास रहा। दिल्ली में समय समय पर समाचार पत्र और पत्रिकाओं का सम्पादन किया और आजादी के परवानों के त्याग और तपस्या को रेखाँकित करती प्रदर्शनियों का आयोजन किया। एक साप्ताहिक पत्र ''देश की पुकार'' भी निकाला। ''अमर शहीद भगत सिंह स्मारक समिति'' का गठन कर क्रांतिकारी आंदोलन की बारीकियों और अनछुए पहलूओं पर शोध कार्य किया और ''स्वाधीनता  विशेषांक '' प्रकाशित किये। प्रसिध्द कहानीकार पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र ' की स्मृति में  हास्य व्यंग की सालाना पत्रिका '' ठिठोली'' का संपादन किया। वे आत्मप्रचार से सदैव दूर रहे। आजादी के बाद अपने कर्तव्यों से विमुख होते नेताओं के आचरण पर वे सदैव अंगुली उठाते रहे और अपने आप को सक्रीय राजनीती से दूर रखा। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरूजी ने उन्हें दो बार--एक बार फिरोजाबाद और फिर दिल्ली की चांदनी चौक इलाके की संसदीय सीट से सांसद का चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया लेकिन उन्होंने कलुषित राजनीति में प्रवेश करने से सदैव परहेज रखा। कोई पुरूस्कार ग्रहण नहीं किया। सन १९७२ में वे दिल्ली छोड़कर फिरोजाबाद में आ गए और सारा वक्त लेखन और सामाजिक कार्यों में बिताया। उनकी तीन  पुस्तके अंग्रेजी जमाने में जब्त हुई। मसलन, '' तीन क्रांतिकारी शहीद '','' रेशमी पत्रों का षड़यंत्र '', और  'आज के शहीद'। अपने सम्पूर्ण  जीवन में उन्होंने करीब तीन दर्जन पुस्तकें और सैकड़ों लेख लिखे जो अपने वक्त की प्रमुख पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए । ''मशाल '' शीर्षक से उनके लेखों का संग्रह ५० के दशक में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में शामिल लेख -'' गौ पूजा ', '' युग युग से पीड़ित भारतीय नारी '' और '' पुरोहितवाद ''  बेहद चर्चित हुए। 'मशाल' ने देश के कई शहरों में तहलका मचाया। इस पुस्तक को समर्थन मिला तो विरोध भी हुआ। अन्य पुस्तकें इस प्रकार हैं ----'मन के बंधन' ,'चट्टान और लहर' (दोनों कहानी संग्रह ) ,'आजाद हिन्द फ़ौज का इतिहास ',उत्तर-पश्चिम के आजाद कबीले ,'गणेश शंकर विध्यार्थी,' 'शहीद चंद्र शेखर आजाद' ,'मुस्लिम देशभक्त ','आज के शहीद' ,'तीन क्रन्तिकारी शहीद' ,'रेशमी पत्रों का षड़यंत्र', ' बल्लभ भाई पटेल ' आदि गुजरात के स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी श्री बंसल की लिखी जीवनियों को शामिल किया गया था। आखिरी पुस्तक ''चंदवार और फिरोजाबाद का प्राचीन इतिहास '' थी । इसका विमोचन फिरोजाबाद केपीडी जैन इंटर कालेज में पूर्व मंत्री कर्ण सिंह ने किया था। इतिहास के एक अनछुए पृष्ठ को उजागर करती इस पुस्तक तीन संस्करण प्रकाशित हुए। यह पुस्तक फिरोजाबाद से ६ किलोमीटर दूर चंदवार नामक प्रचीन स्थल के बारे में है जहाँ मोहम्मद गौरी और जयचंद का युध्द हुआ था और इस युध्द में जयचंद मारा गया था। यह स्थल इतिहासकारों और पुरातत्ववेताओं की नजरों से आज भी ओझल है। इस पुस्तक पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ''बुलंदी खंडहरों की''का निर्माण भी किया गया है। सन १९८९ में श्री रतन लाल बंसल का निधन हुआ।


कोरोना विशेष

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हमारी बात

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